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उत्तराखंड में भाजपा नेताओं की बगावती तेवरों ने पार्टी को किया असहज, अपने ही सिस्टम पर उठा रहे सवाल


उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर से ही असंतोष के सुर उठने लगे हैं। एक के बाद एक पार्टी के दिग्गज नेता और विधायक अपनी ही सरकार और सिस्टम के खिलाफ सड़कों पर उतरते नजर आ रहे हैं। यह स्थिति न केवल सरकार के लिए असहज है, बल्कि संगठन की चिंता भी बढ़ा रही है।

हालात ऐसे बन चुके हैं कि हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को पार्टी विधायकों और नेताओं को सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की कड़ी हिदायत देनी पड़ी। उन्होंने साफ कहा था कि संगठन से जुड़ी समस्याएं उन्हें बताई जाएं और सरकार से जुड़े मसले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने रखें। बावजूद इसके पार्टी नेताओं पर इस हिदायत का कोई खास असर नहीं दिख रहा।

बंशीधर भगत का थाने के बाहर धरना

कालाढूंगी से विधायक और बीजेपी के वरिष्ठ नेता बंशीधर भगत ने हाल ही में हल्द्वानी कोतवाली के बाहर धरना देकर सबको चौंका दिया। उन्होंने पुलिस पर पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न का आरोप लगाया और नशे के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी प्रशासन पर सवाल खड़े किए। भगत का यह कदम प्रदेश नेतृत्व की उस कोशिश को झटका था, जिसमें संगठनात्मक अनुशासन को बनाए रखने की बात की गई थी।

एक नहीं, कई विधायक उठा रहे सवाल

बंशीधर भगत अकेले नहीं हैं। इससे पहले विकासनगर विधायक मुन्ना सिंह चौहान और गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय ने भी अवैध खनन और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। अरविंद पांडेय के बयान पर तो प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने उन्हें तलब भी किया था। वहीं वरिष्ठ नेता बिशन सिंह चुफाल भी अपनी ही सरकार के एक दर्जाधारी मंत्री को आड़े हाथों ले चुके हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि पहले ये नेता सड़कों पर उतरकर मुद्दा उठाते हैं, मीडिया के सामने सिस्टम की खामियां गिनाते हैं, लेकिन जब मामला तूल पकड़ने लगता है तो बैकफुट पर भी आते देर नहीं करते। बयान पलटते हुए नजर आते हैं, मानो कुछ हुआ ही न हो।

चुनावी दबाव या जनता की नाराजगी?

पार्टी के प्रदेश महामंत्री आदित्य कोठारी मानते हैं कि यह सब अगले विधानसभा चुनाव (2027) की तैयारी का हिस्सा हो सकता है। उन्होंने कहा कि विधायक जनता से किए वादों को निभाने के दबाव में आकर कभी-कभी सख्त कदम उठाते हैं। हालांकि देवप्रयाग विधायक विनोद कंडारी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि जो विधायक पूरे पांच साल सक्रिय रहता है, उसे आखिरी साल में ‘एक्टिव मोड’ में आने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

कांग्रेस को मिला हमला करने का मौका

बीजेपी में चल रही इस अंदरूनी खींचतान को कांग्रेस ने भी भुनाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता गरिमा दसौनी ने कहा कि राज्य में ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से लेकर अन्य विधायक और नेता जिस तरह बयान दे रहे हैं, उससे साफ है कि भाजपा सरकार और संगठन दोनों से नाराजगी है। गरिमा ने यह भी कहा कि अवैध खनन के मुद्दे पर सरकार की कार्यशैली पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं, जिससे साबित होता है कि पिछले चार सालों में सरकार कोई ठोस काम नहीं कर पाई है।



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